दादा की संपत्ति पर पोते का कितना हक होता है? कानूनी नियम जान लीजिए Property Rights

Published On: February 9, 2026
Property Rights

Property Rights: भारतीय परिवारों में संपत्ति का बंटवारा और विरासत के मुद्दे अक्सर झगड़ों, विवादों और कानूनी लड़ाइयों का मुख्य कारण बन जाते हैं। ये विवाद न केवल परिवार के सदस्यों के बीच कड़वाहट पैदा करते हैं बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाले कानूनी मुकदमों में भी बदल जाते हैं। इन सभी संपत्ति विवादों में सबसे आम और जटिल सवाल यह है कि दादा की संपत्ति पर पोते का कितना और किस प्रकार का अधिकार होता है। यह प्रश्न विशेष रूप से तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब पिता जीवित हैं और दादा की संपत्ति का बंटवारा होना है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम उन्नीस सौ छप्पन और इसके विभिन्न संशोधनों के अनुसार पोते के अधिकार संपत्ति के प्रकार पर निर्भर करते हैं।

मुख्य रूप से संपत्ति दो प्रकार की होती है। पहली है स्व-अर्जित संपत्ति जो दादा ने अपनी मेहनत, नौकरी या व्यवसाय से कमाई है। दूसरी है पैतृक संपत्ति जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है। इन दोनों प्रकार की संपत्तियों में पोते के अधिकार पूरी तरह से अलग-अलग होते हैं। यदि पिता जीवित हैं तो पोता दादा की स्व-अर्जित संपत्ति पर सीधा दावा नहीं कर सकता है। हालांकि पैतृक संपत्ति में पोते को जन्म से ही कुछ अधिकार मिल सकते हैं। इस लेख में हम इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझेंगे ताकि आप अपने कानूनी अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त कर सकें।

स्व-अर्जित संपत्ति की परिभाषा और नियम

स्व-अर्जित संपत्ति वह संपत्ति होती है जो दादा ने अपने जीवन काल में अपनी व्यक्तिगत कमाई, नौकरी के वेतन, व्यवसाय से होने वाली आय या किसी रिश्तेदार या मित्र द्वारा दिए गए उपहार से खरीदी या अर्जित की है। इस प्रकार की संपत्ति में जमीन, मकान, फ्लैट, दुकान, व्यावसायिक संपत्ति या कोई अन्य अचल संपत्ति शामिल हो सकती है। स्व-अर्जित संपत्ति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें पोते का कोई जन्मजात या स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं होता है। दादा इस संपत्ति के पूर्ण और एकमात्र मालिक होते हैं और उन्हें पूरा कानूनी अधिकार है कि वे इस संपत्ति को अपनी इच्छानुसार किसी को भी वसीयत कर दें, बेच दें, दान कर दें या किसी अन्य तरीके से निपटान कर दें।

यदि दादा की मृत्यु बिना किसी वसीयत के हो जाती है तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं। इस स्थिति में संपत्ति का विभाजन कानून द्वारा निर्धारित क्रम के अनुसार होता है। पहली प्राथमिकता में दादा की पत्नी यानी दादी, उनके सभी बेटे और सभी बेटियां बराबर के हिस्सेदार बनते हैं। इस चरण में पोता सीधे तौर पर कोई हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकता। पोता केवल तब ही संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा कर सकता है जब उसके पिता यानी दादा के बेटे की मृत्यु दादा से पहले हो चुकी हो। ऐसी स्थिति में पोता अपने मृत पिता के स्थान पर प्रतिनिधित्व करता है और वह हिस्सा प्राप्त करता है जो उसके पिता को मिलता। यह नियम बहुत स्पष्ट रूप से बताता है कि जब तक माता-पिता जीवित हैं तब तक पोते को धैर्य रखना पड़ता है और वह सीधे दादा की स्व-अर्जित संपत्ति पर दावा नहीं कर सकता।

पैतृक संपत्ति के विशेष और अलग नियम

पैतृक संपत्ति की अवधारणा हिंदू कानून में बहुत विशिष्ट और महत्वपूर्ण है। पैतृक संपत्ति वह संपत्ति होती है जो कम से कम चार पीढ़ियों से निरंतर पुरुष वंशजों के माध्यम से अविभाजित रूप से चली आ रही है। इसका मतलब यह है कि यह संपत्ति परदादा से दादा को मिली, दादा से पिता को मिली और अब पोते तक आ रही है। पैतृक संपत्ति में पोते की स्थिति पूरी तरह से अलग और विशेष होती है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार पैतृक संपत्ति में पोता जन्म लेते ही स्वतः ही कोपार्सिनर यानी संयुक्त मालिक या सहस्वामी बन जाता है। इसका अर्थ यह है कि पोते को इस संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त होता है।

पैतृक संपत्ति में पोते का यह अधिकार बहुत मजबूत होता है और वह दादा या पिता की मृत्यु का इंतजार किए बिना किसी भी समय संपत्ति के विभाजन की मांग कर सकता है। यह एक बहुत महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार है जो केवल पैतृक संपत्ति में ही उपलब्ध होता है। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अपवाद समझना जरूरी है। यदि दादा ने अपने जीवनकाल में पैतृक संपत्ति का औपचारिक रूप से विभाजन कर दिया है और पिता को उनका हिस्सा दे दिया है तथा पिता अलग हो गए हैं, तो शेष बची हुई संपत्ति अब पैतृक संपत्ति नहीं रह जाती। वह दादा की स्व-अर्जित संपत्ति बन जाती है और उस पर पोते का कोई स्वतः अधिकार नहीं रहता।

हाल के वर्षों में विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों ने भी यह पुष्टि की है कि यदि पिता जीवित हैं तो पोता दादा की स्व-अर्जित संपत्ति पर सीधा दावा नहीं कर सकता। वर्ष दो हजार पांच में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में किए गए महत्वपूर्ण संशोधन ने बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिए हैं। हालांकि पोतों का मामला अभी भी मुख्य रूप से उनके पिता के हिस्से से जुड़ा हुआ है।

संपत्ति पर दावा करने के व्यावहारिक तरीके

यदि आपको लगता है कि आपका दादा की संपत्ति में कानूनी हक है तो सबसे पहले संपत्ति से संबंधित सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों की गहन जांच करें। इन दस्तावेजों में संपत्ति की रजिस्ट्री, दादा द्वारा बनाई गई वसीयत, म्यूटेशन रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी और अन्य भूमि अभिलेख शामिल हैं। यदि संपत्ति को लेकर परिवार में विवाद है या आपको लगता है कि आपके साथ अन्याय हो रहा है तो आप सिविल कोर्ट में संपत्ति विभाजन के लिए मुकदमा दायर कर सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक अनुभवी संपत्ति वकील की सहायता लेना अत्यंत आवश्यक है।

दादा की संपत्ति पर पोते का अधिकार संपत्ति के प्रकार पर निर्भर करता है। स्व-अर्जित संपत्ति में पिता जीवित होने पर सीधा दावा नहीं किया जा सकता जबकि पैतृक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिलता है।

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। यहां प्रस्तुत जानकारी प्रदान किए गए दस्तावेज़ और सामान्य हिंदू उत्तराधिकार कानून पर आधारित है। संपत्ति के अधिकार परिवार की विशिष्ट परिस्थितियों, वसीयत की उपस्थिति और राज्य के कानूनों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले एक अनुभवी संपत्ति वकील से परामर्श अवश्य लें और अपने मामले की विशिष्ट जानकारी प्राप्त करें।

Aarti Sharma

Aarti Sharma is a talented writer and editor at a top news portal, shining with her concise takes on government schemes, news, tech, and automobiles. Her engaging style and sharp insights make her a beloved voice in journalism.

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